दंड प्रक्रिया संहिता, 1973/अध्याय 16/234 / 534
206छोटे अपराधों के मामले में विशेष समन
अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 64स्रोत
(1) यदि किसी छोटे अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की राय में मामले को [धारा 260 या धारा 261 के अधीन] संक्षेपतः निपटाया जा सकता है तो वह मजिस्ट्रेट उस दशा के सिवाय जहां उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे उसकी प्रतिकूल राय है, अभियुक्त से यह अपेक्षा करते हुए उसके लिए समन जारी करेगा कि वह विनिर्दिष्ट तारीख को मजिस्ट्रेट के समक्ष या तो स्वयं या प्लीडर द्वारा हाजिर हो या वह मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर हुए बिना आरोप का दोषी होने का अभिवचन करना चाहता है तो लिखित रूप में उक्त अभिवाक् और समन में विनिर्दिष्ट जुर्माने की रकम डाक या संदेशवाहक द्वारा विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व भेज दे या यदि वह प्लीडर द्वारा हाजिर होना चाहता है और ऐसे प्लीडर द्वारा उस आरोप के दोषी होने का अभिवचन करना चाहता है तो प्लीडर को अपनी ओर से आरोप के दोषी होने का अभिवचन करने के लिए लिखकर प्राधिकृत करे और ऐसे प्लीडर की मार्फत जुर्माने का संदाय करे :
परंतु ऐसे समन में विनिर्दिष्ट जुर्माने की रकम “[एक हजार रुपए] से अधिक न होगी ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “छोटे अपराध” से कोई ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो केवल एक हजार रुपए से अनधिक जुर्माने से दंडनीय है किंतु इसके अंतर्गत कोई ऐसा अपराध नहीं है जो मोटरयान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) के अधीन या किसी अन्य ऐसी विधि के अधीन, जिसमें दोषी होने के अभिवाक् पर अभियुक्त की अनुपस्थिति में उसको दोषसिद्ध करने के लिए उपबंध है, इस प्रकार दंडनीय है।
[(3) राज्य सरकार, किसी मजिस्ट्रेट को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे अपराध के संबंध में करने के लिए, जो धारा 320 के अधीन शमनीय है, या जो कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से अधिक नहीं है या जुर्माने से या दोनों से दंडनीय है अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से वहां सशक्त कर सकती है, जहां मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए मजिस्ट्रेट की राय है कि केवल जुर्माना अधिरोपित करने से न्याय के उद्देश्य पूरे हो जाएंगे ।]
संशोधन टिप्पणियां
- 2005 के अधिनियम सं० 25 की धारा 20 द्वारा “धारा 260 के अधीन” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2005 के अधिनियम सं० 25 की धारा 20 द्वारा “एक सौ रुपए” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1978 के अधिनियम सं० 45 की धारा 18 द्वारा अंतःस्थापित ।
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