दंड प्रक्रिया संहिता, 1973/अध्याय 4/40 / 534
39कुछ अपराधों की इत्तिला का जनता द्वारा दिया जाना
अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 11–12स्रोत
(1) प्रत्येक व्यक्ति जो भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की निम्नलिखित धाराओं के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किए जाने से या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा करने के आशय से अवगत है, उचित प्रतिहेतु के अभाव में, जिसे साबित करने का भार इस प्रकार अवगत व्यक्ति पर होगा, ऐसे किए जाने या आशय की इत्तिला तुरंत निकटतम मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को देगा, अर्थात्:—
(i) धारा 121 से 126, दोनों सहित, और धारा 130 (अर्थात्, उक्त संहिता के अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट राज्य के विरुद्ध अपराध) ;
(ii) धारा 143, 144, 145, 147 और 148 (अर्थात्, उक्त संहिता के अध्याय 8 में विनिर्दिष्ट लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराध) ;
(iii) धारा 161 से 165क, दोनों सहित, (अर्थात्, अवैध परितोषण से संबंधित अपराध) ;
(iv) धारा 272 से 278, दोनों सहित, (अर्थात्, खाद्य और औषधियों के अपमिश्रण से संबंधित अपराध आदि) ;
(v) धारा 302, 303 और 304 (अर्थात् जीवन के लिए संकटकारी अपराध) ;
[(४क) धारा 364क (अर्थात् फिरौती, आदि के लिए व्यपहरण से संबंधित अपराध) ;]
(vi) धारा 382 (अर्थात्, चोरी करने के लिए मृत्यु, उपहति या अवरोधकारित करने की तैयार के पश्चात् चोरी का अपराध) ;
(vii) धारा 392 से 399, दोनों सहित, और धारा 402 (अर्थात्, लूट और डकैती के अपराध) ;
(viii) धारा 409 (अर्थात्, लोक सेवक आदि द्वारा आपराधिक न्यासभंग से संबंधित अपराध) ;
(४0 धारा 431 से 439, दोनों सहित, (अर्थात्, संपत्ति के विरुद्ध रिष्टि के अपराध) ;
(x) धारा 449 और 450 (अर्थात्, गृह अतिचार का अपराध) ;
(xi) धारा 456 से 460, दोनों सहित, (अर्थात्, प्रच्छन्न गृह अतिचार के अपराध) ; और
(xii) धारा 489क से 489ड, दोनों सहित, (अर्थात्, करेंसी नोटों और बैंक नोटों से संबंधित अपराध) ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “अपराध” शब्द के अंतर्गत भारत के बाहर किसी स्थान में किया गया कोई ऐसा कार्य भी है जो यदि भारत में किया जाता तो अपराध होता ।
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- 1993 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित ।
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