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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023/अध्याय 15/215 / 531

215लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के लिए और साक्ष्य में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के लिए अभियोजन

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, राजपत्र पृष्ठ 249–250स्रोत

(1) कोई न्यायालय,—

(क) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से धारा 223 (जिनके अंतर्गत धारा 209 के सिवाय ये दोनों धाराएं भी हैं) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का ; या

(ii) ऐसे अपराध के किसी दुष्प्रेरण या ऐसा अपराध करने के प्रयत्न का ; या

(iii) ऐसा अपराध करने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, संज्ञान संबद्ध लोक सेवक के, या किसी अन्य ऐसे लोक सेवक के, जिसके वह प्रशासनिक तौर पर अधीनस्थ है या कोई अन्य लोक सेवक जो संबद्ध लोक सेवक द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत है, लिखित परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ;

(ख) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की निम्नलिखित धाराओं अर्थात् धारा 229 से धारा 233 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), धारा 236, धारा 237, धारा 242 से धारा 248 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) और धारा 267 से किन्हीं के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अभिकथित है कि वह किसी न्यायालय में की कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया है ; या

(ii) उक्त संहिता की धारा 336 की उपधारा (1) में वर्णित या धारा 340 की उपधारा (2) या धारा 342 के अधीन दंडनीय अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अभिकथित है कि वह किसी न्यायालय में की कार्यवाही में प्रस्तुत किए गए या साक्ष्य में दिए गए किसी दस्तावेज के बारे में किया गया है ; या

(व) उपखंड (i) या उपखंड (ii) में विनिर्दिष्ट किसी अपराध को करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र या उसे करने के प्रयत्न या उसके दुष्प्रेरण के अपराध का,

संज्ञान ऐसे न्यायालय के, या न्यायालय के ऐसे अधिकारी के, जिसे वह न्यायालय इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत करे या किसी अन्य न्यायालय के, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है लिखित परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं ।

(2) जहां किसी लोक सेवक द्वारा या किसी अन्य लोक सेवक द्वारा जो उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन उसके द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत है, कोई परिवाद किया गया है वहां ऐसा कोई प्राधिकारी, जिसके वह प्रशासनिक तौर पर अधीनस्थ है, उस परिवाद को वापस लेने का आदेश दे सकता है और ऐसे आदेश की प्रति न्यायालय को भेजेगा : और न्यायालय द्वारा उसकी प्राप्ति पर उस परिवाद के संबंध में आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी :

परंतु ऐसे वापस लेने का कोई आदेश उस दशा में नहीं दिया जाएगा जिसमें विचारण प्रथम बार के न्यायालय में समाप्त हो चुका है ।

(3) उपधारा (1) के खंड (ख) में “न्यायालय” शब्द से कोई सिविल, राजस्व या दंड न्यायालय अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत किसी केंद्रीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन गठित कोई अधिकरण भी है, यदि वह उस अधिनियम द्वारा इस धारा के प्रयोजनार्थ न्यायालय घोषित किया गया है ।

(4) उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए, कोई न्यायालय, उस न्यायालय के, जिसमें ऐसे पूर्वकथित न्यायालय की अपीलनीय डिक्रियों या दंडादेशों की साधारणतया अपील होती है, अधीनस्थ समझा जाएगा या ऐसा सिविल न्यायालय, जिसकी डिक्रियों की साधारणतया कोई अपील नहीं होती है, उस मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता वाले प्रधान न्यायालय के अधीनस्थ समझा जाएगा जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर ऐसा सिविल न्यायालय स्थित है :

परन्तु—

(क) जहां अपीलें एक से अधिक न्यायालय में होती हैं वहां अवर अधिकारिता वाला अपील न्यायालय वह न्यायालय होगा जिसके अधीनस्थ ऐसा न्यायालय समझा जाएगा ;

(ख) जहां अपीलें सिविल न्यायालय में और राजस्व न्यायालय में भी होती हैं वहां ऐसा न्यायालय उस मामले या कार्यवाही के स्वरूप के अनुसार, जिसके संबंध में उस अपराध का किया जाना अभिकथित है, सिविल या राजस्व न्यायालय के अधीनस्थ समझा जाएगा ।

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