दंड प्रक्रिया संहिता, 1973/अध्याय 17/239 / 534
211आरोप की अंतर्वस्तु
अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 65–66स्रोत
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का कथन होगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है ।
(2) यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया गया है तो आरोप में उसी नाम से उस अपराध का वर्णन किया जाएगा ।
(3) यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया गया है तो अपराध की इतनी परिभाषा देनी होगी जितनी से अभियुक्त को उस बात की सूचना हो जाए जिसका उस पर आरोप है।
(4) वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कथित है, आरोप में उल्लिखित होगी ।
(5) यह तथ्य कि आरोप लगा दिया गया है इस कथन के समतुल्य है कि विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक शर्त जिससे आरोपित अपराध बनता है उस विशिष्ट मामले में पूरी हो गई हैं ।
(6) आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा ।
(7) यदि अभियुक्त किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किए जाने पर किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए ऐसी पूर्व दोषसिद्धि के कारण वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड को प्रभावित करने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जिसे न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए देना ठीक समझे तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित होंगे ; और यदि ऐसा कथन रह गया है तो न्यायालय दंडादेश देने के पूर्व किसी समय भी उसे जोड़ सकेगा ।
दृष्टांत
(क) क पर ख की हत्या का आरोप है । यह बात इस कथन के समतुल्य है कि क का कार्य भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 299 और 300 में दी गई हत्या की परिभाषा के अंदर आता है और वह उसी संहिता के साधारण अपवादों में से किसी के अंदर नहीं आता और वह धारा 300 के पांच अपवादों में से किसी के अंदर भी नहीं आता, या यदि वह अपवाद 1 के अंदर आता है तो उस अपवाद के तीन परंतुकों में से कोई न कोई परंतुक उसे लागू होता है।
(ख) क पर असन के उपकरण द्वारा ख को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326 के अधीन आरोप है । यह इस कथन के समतुल्य है कि उस मामले के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 335 द्वारा उपबंध नहीं किया गया है और साधारण अपवाद उसको लागू नहीं होते हैं ।
(ग) क पर हत्या, छल, चोरी, उद्दीपन, जारकर्म या आपराधिक अभित्रास या मिथ्या संपत्ति चिह्न को उपयोग में लाने का अभियोग है । आरोप में उन अपराधों की भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में दी गई परिभाषाओं के निर्देश के बिना यह कथन हो सकता है कि क ने हत्या या छल या चोरी या उद्दीपन या जारकर्म या आपराधिक अभित्रास किया है या यह कि उसने मिथ्या संपत्ति चिह्न का उपयोग किया है ; किंतु प्रत्येक दशा में वे धाराएं, जिनके अधीन अपराध दंडनीय है, आरोप में निर्दिष्ट करनी पड़ेंगी ।
(घ) क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 184 के अधीन यह आरोप है कि उसने लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित संपत्ति के विक्रय में साशय बाधा डाली है । आरोप उन शब्दों में ही होना चाहिए ।
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