भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 1/4 / 570
4राज्यक्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार
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यह धारा बदल दी गई है
भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू
1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।
इस संहिता के उपबंध—
[(1) भारत से बाहर और परे किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा ;
(2) भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर, चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा, किए गए किसी अपराध को भी लागू है ;]
[(3) भारत में अवस्थित कंप्यूटर संसाधन को लक्ष्य बनाकर भारत के बाहर और परे किसी स्थान पर किसी व्यक्ति द्वारा अपराध का किया जाना ।]
[स्पष्टीकरण—इस धारा में,—
(क) “अपराध” शब्द के अन्तर्गत भारत से बाहर किया गया ऐसा हर कार्य आता है, जो यदि भारत में किया गया होता तो इस संहिता के अधीन दंडनीय होता ।
(ख) “कंप्यूटर संसाधन” पद का वही अर्थ है, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ट) में है ;]
[दृष्टांत]
*** क [जो [भारत का नागरिक है]] उगांडा में हत्या करता है । वह [भारत] के किसी स्थान में, जहां वह पाया जाए, हत्या के लिए विचारित और दोषसिद्ध किया जा सकता है ।
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संशोधन टिप्पणियां
- भारतीय दंड संहिता का विस्तार बरार विधि अधिनियम, 1941 (1941 का 4) द्वारा बरार पर किया गया है और इसे निम्नलिखित स्थानों पर प्रवृत्त घोषित किया गया है :— संथाल परगना व्यवस्थापन विनियम (1872 का 3) की धारा 2 द्वारा संथाल परगनों पर ; पंथ पिपलोदा, विधि विनियम, 1929 (1929 का 1) की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा पंथ पिपलोदा पर ; खोंडमल विधि विनियम, 1936 (1936 का 4) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा खोंडमल जिले पर ; और आंगुल विधि विनियम, 1936 (1936 का 5) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा आंगुल जिले पर ; इसे अनुसूचित जिला अधिनियम, 1874 (1874 का 14) की धारा 3 (क) के अधीन निम्नलिखित जिलों में प्रवृत्त घोषित किया गया है, अर्थात्— संयुक्त प्रान्त तराई जिले—देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1876, भाग 1, पृ० 505, हजारीबाग, लोहारदग्गा के जिले [जो अब रांची जिले के नाम से ज्ञात हैं,—देखिए कलकत्ता राजपत्र (अंग्रेजी), 1899, भाग 1, पृ० 44 और मानभूम और परगना] । दालभूम तथा सिंहभूम जिलों में कोलाहन—देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1881, भाग 1, पृ० 504 । उपरोक्त अधिनियम की धारा 5 के अधीन इसका विस्तार लुशाई पहाड़ियों पर किया गया है—देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1898, भाग 2, पृ० 345 । इस अधिनियम का विस्तार, गोवा, दमण तथा दीव पर 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ; दादरा तथा नागर हवेली पर 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा ; पांडिचेरी पर 1963 के विनियम सं० 7 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा और लकादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप पर 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया है।
- “ब्रिटिश भारत” शब्द अनुक्रमशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए हैं ।
- 1898 के अधिनियम सं० 4 की धारा 2 द्वारा मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा खण्ड (1) से खण्ड (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2009 के अधिनियम सं० 10 की धारा 51 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 2009 के अधिनियम सं० 10 की धारा 51 द्वारा प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा “दृष्टांत” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1957 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा “(क)” कोष्ठकों और अक्षर का लोप किया गया।
- भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948 द्वारा “कोई कुली जो भारत का मूल नागरिक है” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा “भारतीय अधिवास का कोई ब्रिटिश नागरिक” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- “ब्रिटिश भारत” शब्द अनुक्रमशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा दृष्टांत (ख), (ग) तथा (घ) का लोप किया गया ।
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