भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872/अध्याय 1/3 / 185
3निर्वचन-खंड
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भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू
बीएसए से मिलान जल्द1 जुलाई 2024 से ठीक पहले लंबित आवेदन, विचारण, जांच, अन्वेषण, कार्यवाही या अपील इसी पुराने अधिनियम के अनुसार निपटाए जाते हैं (बीएसए धारा 170)।
इस अधिनियम में निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो—
“न्यायालय”—“न्यायालय” शब्द के अन्तर्गत सभी न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट तथा मध्यस्थों के सिवाय साक्ष्य लेने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत सभी व्यक्ति आते हैं ।
तथ्य—“तथ्य” से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आती हैं—
(1) ऐसी कोई वस्तु, वस्तुओं की अवस्था, या वस्तुओं का सम्बन्ध जो इन्द्रियों द्वारा बोधगम्य हो;
(2) कोई मानसिक दशा, जिसका भान किसी व्यक्ति को हो ।
दृष्टांत
(क) यह कि अमुक स्थान में अमुक क्रम से अमुक पदार्थ व्यवस्थित हैं, एक तथ्य है ।
(ख) यह कि किसी मनुष्य ने कुछ सुना या देखा, एक तथ्य है ।
(ग) यह कि किसी मनुष्य ने अमुक शब्द कहे, एक तथ्य है ।
(घ) यह कि कोई मनुष्य अमुक राय रखता है, अमुक आशय रखता है, सद्भावपूर्वक या कपटपूर्वक कार्य करता है, या किसी विशिष्ट शब्द को विशिष्ट भाव में प्रयोग करता है, या उसे किसी विशिष्ट संवेदना का भान है या किसी विनिर्दिष्ट समय में था, एक तथ्य है ।
(ङ) यह कि किसी मनुष्य की अमुक ख्याति है, एक तथ्य है ।
“सुसंगत”—एक तथ्य दूसरे तथ्य से सुसंगत कहा जाता है जब कि तथ्यों की सुसंगति से सम्बन्धित इस अधिनियम के उपबन्धों में निर्दिष्ट प्रकारों में से किसी भी प्रकार से वह तथ्य उस दूसरे तथ्य से संसक्त हो ।
“विवाद्यक तथ्य”—“विवाद्यक तथ्य” से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आता है—
ऐसा कोई भी तथ्य जिस अकेले ही से, या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी ऐसे अधिकार, दायित्व या निर्योग्यता के, जिसका किसी वाद या कार्यवाही में प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया गया है, अस्तित्व, अनस्तित्व, प्रकृति या विस्तार की उपपत्ति अवश्यमेव होती है ।
स्पष्टीकरण—जब कभी कोई न्यायालय विवाद्यक तथ्य को सिविल प्रक्रिया से सम्बन्धित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों के अधीन अभिलिखित करता है, तब ऐसे विवाद्यक के उत्तर में जिस तथ्य का प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया जाना है, वह विवाद्यक तथ्य है ।
दृष्टांत
ख की हत्या का क अभियुक्त है ।
उसके विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्य हो सकते हैं—
यह कि क ने ख की मृत्यु कारित की, यह कि क का आशय ख की मृत्यु कारित करने का था, यह कि क को ख से गम्भीर और अचानक प्रकोपन मिला था,
यह कि ख की मृत्यु कारित करने का कार्य करते समय क चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति जानने में असमर्थ था ।
“दस्तावेज”—“दस्तावेज” से ऐसा कोई विषय अभिप्रेत है जिसको किसी पदार्थ पर अक्षरों, अंकों या चिह्नों के साधन द्वारा या उनमें से एक से अधिक साधनों द्वारा अभिव्यक्त या वर्णित किया गया है जो उस विषय के अभिलेखन के प्रयोजन से उपयोग किए जाने को आशयित हो या उपयोग किया जा सके ।
दृष्टांत
लेख दस्तावेज है;
मुद्रित, शिला मुद्रित या फोटोचित्र शब्द दस्तावेज हैं;
मानचित्र या रेखांक दस्तावेज है;
धातुपट्ट या शिला पर उत्कीर्ण लेख दस्तावेज है;
उपहासांकन दस्तावेज है ।
“साक्ष्य”—“साक्ष्य” शब्द से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आते हैं—
(1) वे सभी कथन जिनके, जांचाधीन तथ्य के विषयों के सम्बन्ध में न्यायालय अपने सामने साक्षियों द्वारा किए जाने की अनुज्ञा देता है, या अपेक्षा करता है; ऐसे कथन मौखिक साक्ष्य कहलाते हैं;
ऐसे कथन मौखिक साक्ष्य कहलाते हैं;
(2) [न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई सब दस्तावेजें, जिनके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक अभिलेख भी हैं;] ऐसी दस्तावेजें दस्तावेजी साक्ष्य कहलाती हैं ।
“साबित”—कोई तथ्य साबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष के विषयों पर विचार करने के पश्चात् या तो यह विश्वास करे कि उस तथ्य का अस्तित्व है या उसके अस्तित्व को इतना अधिसम्भाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व है ।
“नासाबित”—कोई तथ्य नासाबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष विषयों पर विचार करने के पश्चात् या तो यह विश्वास करे कि उसका अस्तित्व नहीं है, या उसके अनस्तित्व को इतना अधिसम्भाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व नहीं है ।
“साबित नहीं हुआ”—कोई तथ्य साबित नहीं हुआ कहा जाता है, जब वह न तो साबित किया गया हो और न नासाबित ।
“भारत”— [“भारत” से जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।]
[पद “प्रमाणकर्ता प्राधिकारी”, [“इलैक्ट्रानिक चिह्नक”], [इलैक्ट्रानिक चिह्नक प्रमाणपत्र], “इलैक्ट्रानिक रूप”, “इलैक्ट्रानिक अभिलेख”, “सूचना”, “सुरक्षित इलैक्ट्रानिक अभिलेख”, “सुरक्षित [इलैक्ट्रानिक चिह्नक]” और “उपयोगकर्ता”, के वही अर्थ होंगे, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) में हैं ।]
संशोधन टिप्पणियां
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 2; भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 19; और “जिला न्यायाधीश” की परिभाषा के लिए साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3(17) की तुलना करें ।
- साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) धारा 3(32) और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की तुलना करें ।
- अब सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) देखिए; विवाद्यकों के स्थिरीकरण के बारे में अनुसूची 1 का आदेश 14 देखें ।
- भारतीय दंड प्रक्रिया (1860 का 45) की धारा 29 और साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3 (18) की तुलना करें ।
- साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3(65) में “लेख” की परिभाषा की तुलना करें ।
- 2000 के अधिनियम सं० 21 की धारा 92 और दूसरी अनुसूची द्वारा (17-10-2000 से) “न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई सब दस्तावेजें” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा “राज्य” तथा “राज्यों” की परिभाषा के स्थान पर प्रतिस्थापित, जो विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा अंतःस्थापित की गई थी ।
- 2000 के अधिनियम सं० 21 की धारा 92 और दूसरी अनुसूची द्वारा (17-10-2000 से) अंतःस्थापित ।
- 2009 के अधिनियम सं० 10 की धारा 52 द्वारा (27-10-2009 से) “अंकीय चिह्नक” और “अंकीय चिह्नक प्रमाणपत्र” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
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