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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023/अध्याय 28/379 / 531

379धारा 245 में वर्णित मामलों में प्रक्रिया

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, राजपत्र पृष्ठ 320–321स्रोत

(1) जब किसी न्यायालय की, उससे इस निमित्त किए गए आवेदन पर या अन्यथा, यह राय है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि धारा 245 की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी अपराध की, जो उसे, यथास्थिति, उस न्यायालय की कार्यवाही में या उसके संबंध में या उस न्यायालय की कार्यवाही में साक्ष्य में प्रस्तुत या दिए गए दस्तावेज के बारे में किया हुआ प्रतीत होता है, जांच की जानी चाहिए, तब ऐसा न्यायालय ऐसी प्रारंभिक जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, जैसी वह आवश्यक समझे,—

(क) उस प्रभाव का निष्कर्ष अभिलिखित कर सकेगा ;

(ख) उसका लिखित परिवाद कर सकेगा ;

(ग) उसकी अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को भैज सकेगा ;

(घ) ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त के उपस्थित होने के लिए पर्याप्त प्रतिभूति ले सकेगा या यदि अभिकथित अपराध अजमानतीय है और न्यायालय ऐसा करना आवश्यक समझता है तो, अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास अभिरक्षा में भेज सकेगा ; और

(ङ) ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने और साक्ष्य देने के लिए किसी व्यक्ति को आबद्ध कर सकेगा ।

(2) किसी अपराध के बारे में न्यायालय को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग, ऐसे मामले में जिसमें उस न्यायालय ने उपधारा (1) के अधीन उस अपराध के बारे में न तो परिवाद किया है और न ऐसे परिवाद के किए जाने के लिए आवेदन को नामंजूर किया है, उस न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा जिसके अधीनस्थ ऐसा पूर्वकथित न्यायालय धारा 215 की उपधारा (4) के अर्थ में है ।

(3) इस धारा के अधीन किए गए परिवाद पर हस्ताक्षर,—

(क) जहां परिवाद करने वाला न्यायालय उच्च न्यायालय है वहां उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा किए जाएंगे, जिसे वह न्यायालय नियुक्त करे ;

(ख) किसी अन्य मामले में, न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा या न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे न्यायालय इस निमित्त लिखित में प्राधिकृत करे, किए जाएंगे ।

(4) इस धारा में “न्यायालय” का वही अर्थ है जो धारा 215 में उसका है ।

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