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भारतीय दंड संहिता, 1860

भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 10/198 / 570

177मिथ्या इत्तिला देना

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 34स्रोत

यह धारा बदल दी गई है

भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू

1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।

जो कोई किसी लोक सेवक को ऐसे लोक सेवक के नाते किसी विषय पर इत्तिला देने के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए उस विषय पर सच्ची इत्तिला के रूप में ऐसी इत्तिला देगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है या जिसके मिथ्या होने का विश्वास करने का कारण उसके पास है, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, अथवा, यदि वह इत्तिला, जिसे देने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध हो, कोई अपराध किए जाने के विषय में हो, या किसी अपराध के किए जाने का निवारण करने के प्रयोजन से, या किसी अपराधी को पकड़ने के लिए अपेक्षित हो, तो वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

दृष्टांत

(क) क, एक भू-धारक, यह जानते हुए कि उसकी भू-सम्पदा की सीमाओं के अंदर एक हत्या की गई है, उस जिले के मजिस्ट्रेट को जानबूझकर यह मिथ्या इत्तिला देता है कि मृत्यु सांप के काटने के परिणामस्वरूप दुर्घटना से हुई है । क इस धारा में परिभाषित अपराध का दोषी है ।

(ख) क, जो ग्राम चौकीदार है, यह जानते हुए कि अनजाने लोगों का एक बड़ा गिरोह य के गृह में, जो पड़ोस के गांव का निवासी एक धनी व्यापारी है, डकैती करने के लिए उसके गांव से होकर गया है और बंगाल संहिता 1821 के विनियम 3 की धारा 7 के खंड 5 के अधीन निकटतम पुलिस थाने के आफिसर को उपरोक्त घटना की इत्तिला शीघ्र और ठीक समय पर देने के लिए आबद्ध होते हुए, पुलिस आफिसर को जानबूझकर यह मिथ्या इत्तिला देता है कि संदिग्धशील के लोगों का एक गिरोह किसी भिन्न दिशा में स्थित एक दूरस्थ स्थान पर डकैती करने के लिए गांव से होकर गया है । यहां क, इस धारा के दूसरे भाग में परिभाषित अपराध का दोषी है ।

[स्पष्टीकरण—धारा 176 में और इस धारा में “अपराध” शब्द के अंतर्गत [भारत] से बाहर किसी स्थान पर किया गया कोई ऐसा कार्य आता है, जो यदि [भारत] में किया जाता, तो निम्नलिखित धारा अर्थात् 302, 304, 382, 392, 393, 394, 395, 396, 397, 398, 399, 402, 435, 436, 449, 450, 457, 458, 459 और 460 में से किसी धारा के अधीन दंडनीय होता; और “अपराधी” शब्द के अंतर्गत कोई भी ऐसा व्यक्ति आता है, जो कोई ऐसा कार्य करने का दोषी अभिकथित हो ।]

संशोधन टिप्पणियां

  1. 1862 के अधिनियम सं० 17 द्वारा निरसित ।
  2. 1894 के अधिनियम सं० 3 की धारा 5 द्वारा जोड़ा गया ।
  3. “ब्रिटिश भारत” शब्द अनुक्रमशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए हैं ।

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