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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023/अध्याय 9/135 / 531

135सूचना की सच्चाई के बारे में जांच

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, राजपत्र पृष्ठ 207–208स्रोत

(1) जब धारा 130 के अधीन आदेश किसी व्यक्ति को, जो न्यायालय में उपस्थित है, धारा 131 के अधीन पढ़कर सुना या समझा दिया गया है या, जब कोई व्यक्ति धारा 132 के अधीन जारी किए गए समन या वारंट के अनुपालन या निष्पादन में मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित है या लाया जाता है तब मजिस्ट्रेट उस सूचना की सच्चाई के बारे में जांच करने के लिए जिसके आधार पर वह कार्रवाई की गई है और ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य लेने के लिए जो उसे आवश्यक प्रतीत हो अग्रसर होगा ।

(2) ऐसी जांच यथासाध्य, उस रीति से की जाएगी जो समन-मामलों के विचारण और साक्ष्य के अभिलेखन के लिए इसमें इसके पश्चात् विहित है ।

(3) उपधारा (1) के अधीन जांच प्रारंभ होने के पश्चात् और उसकी समाप्ति से पूर्व यदि मजिस्ट्रेट समझता है कि परिशांति भंग का या लोक प्रशांति विक्षुब्ध होने का या किसी अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए, या लोक सुरक्षा के लिए तुरंत उपाय करने आवश्यक हैं, तो वह ऐसे कारणों से, जिन्हें लेखबद्ध किया जाए, उस व्यक्ति को, जिसके बारे में धारा 130 के अधीन आदेश दिया गया है, निदेश दे सकेगा कि वह जांच समाप्त होने तक परिशांति कायम रखने और सदाचारी बने रहने के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करे और जब तक ऐसा बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित नहीं कर दिया जाता है, या निष्पादन में चूक होने की दशा में जब तक जांच समाप्त नहीं हो जाती है, उसे अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जा सकेगा :

परंतु—

(क) किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध धारा 127, धारा 128 या धारा 129 के अधीन कार्यवाही नहीं की जा रही है, सदाचारी बने रहने के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करने के लिए निदेश नहीं दिया जाएगा ;

(ख) ऐसे बंधपत्र की शर्तें, चाहे वे उसकी रकम के बारे में हों या प्रतिभू उपलब्ध करने के या उनकी संख्या के, या उनके दायित्व की धन संबंधी सीमा के बारे में हों, उनसे अधिक दुर्भर न होंगी जो धारा 130 के अधीन आदेश में विनिर्दिष्ट हैं ।

(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह तथ्य कि कोई व्यक्ति आभ्यासिक अपराधी है या ऐसा दु-साहसिक और भयंकर है कि उसका प्रतिभूति के बिना स्वच्छन्द रहना समाज के लिए परिसंकटमय है, साधारण ख्याति के साक्ष्य से या अन्यथा साबित किया जा सकेगा ।

(5) जहां दो या अधिक व्यक्ति जांच के अधीन विषय में सहयुक्त रहे हैं वहां मजिस्ट्रेट एक ही जांच या पृथक् जांचों में, जैसा वह न्यायसंगत समझे, उनके बारे में कार्यवाही कर सकेगा ।

(6) इस धारा के अधीन जांच उसके आरंभ की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर पूरी की जाएगी, और यदि जांच इस प्रकार पूरी नहीं की जाती है तो इस अध्याय के अधीन कार्यवाही उक्त अवधि की समाप्ति पर, पर्यवसित हो जाएगी जब तक उन विशेष कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएं, मजिस्ट्रेट अन्यथा निदेश नहीं देता है :

परंतु जहां कोई व्यक्ति, ऐसी जांच के लंबित रहने के दौरान निरुद्ध रखा गया है वहां उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही, यदि पहले ही समाप्त नहीं हो जाती है तो ऐसे निरोध के छह मास की अवधि की समाप्ति पर समाप्त हो जाएगी ।

(7) जहां कार्यवाहियों को चालू रखने की अनुज्ञा देते हुए उपधारा (6) के अधीन निदेश किया जाता है, वहां सेशन न्यायाधीश व्यथित पक्षकार द्वारा उसे किए गए आवेदन पर ऐसे निदेश को रद्द कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि वह किसी विशेष कारण पर आधारित नहीं था या अनुचित था ।

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