भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 5/120 / 570
115मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण
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यह धारा बदल दी गई है
भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू
1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।
यदि अपराध नहीं किया जाता—जो कोई मृत्यु या [आजीवन कारावास] से दण्डनीय अपराध किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, यदि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप न किया जाए, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध इस संहिता में नहीं किया गया है, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ;
यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है—और यदि ऐसा कोई कार्य कर दिया जाए, जिसके लिए दुष्प्रेरक उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप दायित्व के अधीन हो और जिससे किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो, तो दुष्प्रेरक दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
दृष्टांत
ख को य की हत्या करने के लिए क उकसाता है । वह अपराध नहीं किया जाता है । यदि य की हत्या ख कर देता है, तो वह मृत्यु या [आजीवन कारावास] के दण्ड से दण्डनीय होता । इसलिए, क कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है और जुर्माने से भी दण्डनीय है ; और यदि दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप य को कोई उपहति हो जाती है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
संशोधन टिप्पणियां
- 1955 के अधिनियम सं० 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा “आजीवन निर्वासन” के स्थान पर प्रतिस्थपित ।
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