भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 5/123 / 570
118मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 21स्रोत
यह धारा बदल दी गई है
भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू
1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।
जो कोई मृत्यु या [आजीवन कारावास] से दंडनीय अपराध का किया जाना सुकर बनाने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए, [ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी कार्य या लोप द्वारा या विगूढ़न अथवा किसी अन्य सूचना प्रच्छन्न साधन के उपयोग द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा] या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है, यदि अपराध कर दिया जाए—यदि अपराध नहीं किया जाए—यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, अथवा यदि अपराध न किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और दोनों दशाओं में से हर एक में जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
दृष्टांत
क, यह जानते हुए कि ख स्थान पर डकैती पड़ने वाली है, मजिस्ट्रेट को यह मिथ्या इत्तिला देता है कि डकैती ग स्थान पर, जो विपरीत दिशा में है, पड़ने वाली है और इस आशय से कि एतद्द्वारा उस अपराध का किया जाना सुकर बनाए मजिस्ट्रेट को भुलावा देता है । डकैती परिकल्पना के अनुसरण में ख स्थान पर पड़ती है । क इस धारा के अधीन दंडनीय है ।
संशोधन टिप्पणियां
- 1955 के अधिनियम सं० 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा “आजीवन निर्वासन” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2009 के अधिनियम सं० 10 के धारा 51 द्वारा प्रतिस्थापित ।
यह वेबसाइट केवल जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। किसी भी अंतर की स्थिति में भारत के राजपत्र में प्रकाशित आधिकारिक पाठ ही मान्य होगा।