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भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872/अध्याय 9/144 / 185

126वृत्तिक संसूचनाएं

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 39

यह धारा बदल दी गई है

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू

बीएसए से मिलान जल्द

1 जुलाई 2024 से ठीक पहले लंबित आवेदन, विचारण, जांच, अन्वेषण, कार्यवाही या अपील इसी पुराने अधिनियम के अनुसार निपटाए जाते हैं (बीएसए धारा 170)।

कोई भी बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील अपने कक्षीकार की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में, या के प्रयोजनार्थ उसके कक्षीकार द्वारा, या की ओर से उसे दी गई हो अथवा किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपने वृत्तिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया है, अर्न्तवस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को, जो ऐसे नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसने अपने कक्षीकार को दी है, प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं किया जाएगा :

परन्तु इस धारा की कोई भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण न देगी—

(1) किसी भी [अवैध] प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गई कोई भी ऐसी संसूचना,

(2) ऐसा कोई भी तथ्य जो किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील ने अपनी ऐसी हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में संप्रेषित किया हो, और जिससे दर्शित हो कि उसके नियोजन के प्रारम्भ के पश्चात् कोई अपराध या कपट किया गया है ।

यह तत्त्वहीन है कि ऐसे बैरिस्टर, [प्लीडर], अटर्नी या वकील का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति उसके कक्षीकार के द्वारा या की ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं ।

स्पष्टीकरण—इस धारा में कथित बाध्यता नियोजन के अवसित हो जाने के उपरान्त भी बनी रहती है ।

दृष्टांत

(क) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैंने कूटरचना की है और मैं चाहता हूं कि आप मेरी प्रतिरक्षा करें” ।

यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा आपराधिक प्रयोजन नहीं है, जिसका दोषी होना ज्ञात हो ।

(ख) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैं सम्पत्ति पर कब्जा कूटरचित विलेख के उपयोग द्वारा अभिप्राप्त करना चाहता हूं और इस आधार पर वाद लाने की मैं आपसे प्रार्थना करता हूं” ।

यह संसूचना आपराधिक प्रयोजन के अग्रसर करने में की गई होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है ।

(ग) क पर गबन का आरोप लगाए जाने पर वह अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए अटर्नी ख को प्रतिधारित करता है । कार्यवाही के अनुक्रम में ख देखता है कि क की लेखाबही में यह प्रविष्टि की गई है कि क द्वारा उतनी रकम देनी है जितनी के बारे में अभिकथित है कि उसका गबन किया गया है, जो प्रविष्टि उसके नियोजन के आरम्भ के समय उस बही में नहीं थी ।

यह ख द्वारा अपने नियोजन के अनुक्रम में सम्प्रेक्षित ऐसा तथ्य होने से, जिससे दर्शित होता है कि कपट उस कार्यवाही के प्रारम्भ होने के पश्चात् किया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है ।

संशोधन टिप्पणियां

  1. 1872 के अधिनियम सं० 18 की धारा 10 द्वारा “आपराधिक” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  2. 1872 के अधिनियम सं० 18 की धारा 10 द्वारा अन्तःस्थापित ।

यह वेबसाइट केवल जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। किसी भी अंतर की स्थिति में भारत के राजपत्र में प्रकाशित आधिकारिक पाठ ही मान्य होगा।