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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023/अध्याय 27/367 / 531

367अभियुक्त के विकृतचित्त व्यक्ति होने की दशा में प्रक्रिया

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, राजपत्र पृष्ठ 314–315स्रोत

(1) जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है विकृतचित्त है और परिणामतः अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त-विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा उस जिले के सिविल सर्जन या अन्य ऐसे चिकित्सा अधिकारी द्वारा कराएगा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, और फिर ऐसे सिविल सर्जन या अन्य चिकित्सा अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा और उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा ।

(2) यदि सिविल सर्जन इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल, उपचार और अवस्था के पूर्वानुमान के लिए सरकारी अस्पताल या सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी को निर्दिष्ट करेगा और, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त है या नहीं:

परंतु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा,—

(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनश्चिकित्सा एकक का प्रधान; और

(ख) निकटतम सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में मनश्चिकित्सा संकाय का सदस्य ।

(3) ऐसी परीक्षा और जांच लंबित रहने तक मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 369 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही कर सकेगा ।

(4) यदि मजिस्ट्रेट को यह सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है तो मजिस्ट्रेट आगे यह अवधारित करेगा कि क्या चित्तविकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा तथा अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किंतु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है तो वह जांच को स्थगित करने की बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा:

परंतु यदि मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है जिसके संबंध में चित्तविकृति होने का निष्कर्ष निकाला गया है तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए स्थगित कर देगा जो मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है और अभियुक्त को यह आदेश देगा कि उस पर धारा 369 के अधीन यथा उपबंधित कार्रवाई की जाए ।

(5) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति है तो मजिस्ट्रेट आगे इस बारे में अवधारित करेगा कि बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अभियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्रवाई करेगा ।

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