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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023/अध्याय 27/368 / 531

368न्यायालय के समक्ष विचारित व्यक्ति के विकृतचित्त होने की दशा में प्रक्रिया

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, राजपत्र पृष्ठ 315–316स्रोत

(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के विचारण के समय उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय को वह व्यक्ति विकृतचित्त और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ प्रतीत होता है, तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, प्रथमतः ऐसी चित्त-विकृति और असमर्थता के तथ्य का विचारण करेगा और यदि उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय का ऐसे चिकित्सीय या अन्य साक्ष्य पर, जो उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, विचार करने के पश्चात् उस तथ्य के बारे में समाधान हो जाता है तो वह उस प्रभाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और मामले में आगे की कार्यवाही स्थगित कर देगा ।

(2) यदि मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय विचारण के दौरान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी को निर्देशित करेगा और, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी, मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से ग्रस्त है या नहीं:

परंतु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा,—

(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनश्चिकित्सा एकक का प्रधान; और

(ख) निकटतम सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में मनश्चिकित्सा संकाय का सदस्य ।

(3) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे अवधारित करेगा कि चित्त-विकृति के कारण अभियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किंतु अभियुक्त से प्रश्न पूछे बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह विचारण को स्थगित करने की बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा:

परंतु यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है जिसके संबंध में चित्त-विकृति होने का निष्कर्ष निकाला गया है, तो वह विचारण को ऐसी अवधि के लिए स्थगित कर देगा जो मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है ।

(4) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है और वह बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय विचारण नहीं करेगा और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के संबंध में धारा 369 के अनुसार कार्यवाही की जाए ।

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