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भारतीय दंड संहिता, 1860

भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 12/269 / 570

241किसी सिक्के का असली सिक्के के रूप में परिदान, जिसका परिदान करने वाला उस समय जब वह उसके कब्जे में पहली बार आया था, कूटकृत होना नहीं जानता था

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 47स्रोत

यह धारा बदल दी गई है

भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू

1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।

जो कोई किसी दूसरे व्यक्ति को कोई ऐसा कूटकृत सिक्का, जिसका कूटकृत होना वह जानता हो, किन्तु जिसका वह उस समय, जब उसने उसे अपने कब्जे में लिया, कूटकृत होना नहीं जानता था, असली सिक्के के रूप में परिदान करेगा, या किसी दूसरे व्यक्ति को उसे असली सिक्के के रूप में लेने के लिए उत्प्रेरित करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या इतने जुर्माने से, जो कूटकृत सिक्के के मूल्य के दस गुने तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

दृष्टांत

क, एक सिक्काकार, अपने सह-अपराधी ख को कूटकृत कम्पनी का रुपए चलाने के लिए परिदत्त करता है, ख उन रुपयों को सिक्का चलाने वाले एक दूसरे व्यक्ति ग को बेच देता है, जो उन्हें कूटकृत जानते हुए खरीदता है । ग उन रुपयों को घ को, जो उनको कूटकृत न जानते हुए प्राप्त करता है, माल के बदले दे देता है । घ को रुपया प्राप्त होने के पश्चात् यह पता चलता है कि वे रुपए कूटकृत हैं, और वह उनको इस प्रकार चलाता है, मानो वे असली हों । यहां, घ केवल इस धारा के अधीन दंडनीय है, किन्तु ख और ग, यथास्थिति, धारा 239 या 240 के अधीन दंडनीय हैं ।

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