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भारतीय दंड संहिता, 1860

भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 11/238 / 570

216ऐसे अपराधी को संश्रय देना, जो अभिरक्षा से निकल भागा है या जिसको पकड़ने का आदेश दिया जा चुका है

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 42स्रोत

यह धारा बदल दी गई है

भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू

1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।

जब किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या आरोपित व्यक्ति उस अपराध के लिए वैध अभिरक्षा में होते हुए ऐसी अभिरक्षा से निकल भागे, अथवा जब कभी कोई लोक सेवक ऐसे लोक सेवक की विधिपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति को पकड़ने का आदेश दे, तब जो कोई ऐसे निकल भागने को या पकड़े जाने के आदेश को जानते हुए, उस व्यक्ति को पकड़ा जाना निवारित करने के आशय से उसे संश्रय देगा या छिपाएगा, वह निम्नलिखित प्रकार से दंडित किया जाएगा, अर्थात् :—

यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय हो—यदि वह अपराध, जिसके लिए वह व्यक्ति अभिरक्षा में था या पकड़े जाने के लिए आदेशित है, मृत्यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ;

यदि आजीवन कारावास या कारावास से दंडनीय हो—यदि वह अपराध [आजीवन कारावास] से या दस वर्ष के कारावास से दंडनीय हो, तो वह जुर्माने सहित या रहित दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा ;

तथा यदि वह अपराध ऐसे कारावास से दंडनीय हो, जो एक वर्ष तक का, न कि दस वर्ष तक का हो सकता है, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित भांति के कारावास से, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

[इस धारा में “अपराध” के अंतर्गत कोई भी ऐसा कार्य या लोप भी आता है, जिसका कोई व्यक्ति [भारत] से बाहर दोषी होना अभिकथित हो, जो यदि वह [भारत] में उसका दोषी होता, तो अपराध के रूप में दंडनीय होता और जिसके लिए, वह प्रत्यर्पण से संबंधित किसी विधि के अधीन *** या अन्यथा [भारत] में पकड़े जाने या अभिरक्षा में निरुद्ध किए जाने के दायित्व के अधीन हो, और हर ऐसा कार्य या लोप इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दंडनीय समझा जाएगा, मानो अभियुक्त व्यक्ति [भारत] में उसका दोषी हुआ था ।]

अपवाद—इस उपबंध का विस्तार ऐसे मामले पर नहीं है, जिसमें संश्रय देना या छिपाना पकड़े जाने वाले व्यक्ति के पति या पत्नी द्वारा हो ।

संशोधन टिप्पणियां

  1. 1882 के अधिनियम सं० 8 की धारा 6 द्वारा मूल अपवाद के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  2. 1886 के अधिनियम सं० 10 की धारा 23 द्वारा अंतःस्थापित ।
  3. “ब्रिटिश भारत” शब्द अनुक्रमशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए हैं ।
  4. 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 1881 और अनुसूची द्वारा “या फ्यूजिटिव आफेन्डरस ऐक्ट, 1881 के अधीन” शब्दों का लोप किया गया ।

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