भारतीय दंड संहिता, 1860/अध्याय 11/215 / 570
194मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्धि कराने के आशय से मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना
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यह धारा बदल दी गई है
भारतीय न्याय संहिता, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू
1 जुलाई 2024 से पहले किए गए अपराधों का दंड, और उनका अन्वेषण या कार्यवाही, इसी पुरानी संहिता के अनुसार होते हैं, मानो इसका निरसन नहीं हुआ (बीएनएस धारा 358)।
जो कोई [ [भारत] में तत्समय प्रवृत्त विधि के द्वारा] मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति को दोषसिद्ध कराने के आशय से या संभाव्यतः तद्द्वारा दोषसिद्ध कराएगा यह जानते हुए मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह [आजीवन कारावास] से, या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
यदि निर्दोष व्यक्ति एतद्द्वारा दोषसिद्ध किया जाए और उसे फांसी दी जाए—और यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को ऐसे मिथ्या साक्ष्य के परिणामस्वरूप दोषसिद्ध किया जाए, और उसे फांसी दे दी जाए, तो उस व्यक्ति को, जो ऐसा मिथ्या साक्ष्य देगा, या तो मृत्यु दंड या एतस्मिन्पूर्व वर्णित दंड दिया जाएगा ।
संशोधन टिप्पणियां
- विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा “ब्रिटिश भारत या इंग्लैंड की विधि द्वारा” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा “राज्यों” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1955 के अधिनियम सं० 26 की धारा 117 और अनुसूची द्वारा “आजीवन निर्वासन” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
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