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भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872/अध्याय 2/44 / 185

43धाराओं 40, 41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत हैं

अभी सत्यापित नहींआधिकारिक PDF, PDF पृष्ठ 16–17

यह धारा बदल दी गई है

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 · 1 जुलाई 2024 से लागू

बीएसए से मिलान जल्द

1 जुलाई 2024 से ठीक पहले लंबित आवेदन, विचारण, जांच, अन्वेषण, कार्यवाही या अपील इसी पुराने अधिनियम के अनुसार निपटाए जाते हैं (बीएसए धारा 170)।

धाराओं 40, 41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियां विसंगत हैं जब तक कि ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व विवाद्यक तथ्य न हो या वह इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अन्तर्गत सुसंगत न हो ।

दृष्टांत

(क) क और ख किसी अपमान-लेख के लिए, जो उनमें से हर एक पर लांछन लगाता है, ग पर पृथक्-पृथक् वाद लाते हैं । हर एक मामले में ग कहता है कि वह बात, जिसका अपमालेखीय होना अभिकथित है, सत्य है और परिस्थितियां ऐसी हैं कि वह अधिसम्भाव्यतः या तो हर एक मामले में सत्य है या किसी में नहीं ।

ग के विरुद्ध क इस आधार पर कि ग अपना न्यायोचित साबित करने में असफल रहा नुकसानी की डिक्री अभिप्राप्त करता है । यह तथ्य ख और ग के बीच विसंगत है ।

(ख) क अपनी पत्नी ग के साथ जारकर्म करने के लिए ख का अभियोजन करता है ।

ख इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि ग क की पत्नी है किन्तु न्यायालय ख को जारकर्म के लिए दोषसिद्ध करता है ।

तत्पश्चात् क के जीवनकाल में ख के साथ विवाह करने पर द्वि-विवाह के लिए ग अभियोजित की जाती है । ग कहती है कि वह क की पत्नी कभी नहीं थी ।

ख के विरुद्ध दिया गया निर्णय ग के विरुद्ध विसंगत है ।

(ग) ख का अभियोजन क इसलिए करता है कि उसने क की गाय चुराई है । ख दोषसिद्ध किया जाता है ।

तत्पश्चात् क उस गाय के लिए जिसे ख ने दोषसिद्धि होने से पूर्व ग को बेच दिया था, ग पर वाद लाता है । ख के विरुद्ध वह निर्णय क और ग के बीच विसंगत है ।

(घ) क ने ख के विरुद्ध भूमि के कब्जे की डिक्री अभिप्राप्त की है । ख का पुत्र ग परिणास्वरूप क की हत्या करता है ।

उस निर्णय का अस्तित्व अपराध का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है ।

[(ङ) क पर चोरी और चोरी के लिए पूर्व दोषसिद्धि का आरोप है । पूर्व दोषसिद्धअ विवाद्यक तथ्य होने के नाते सुसंगत है ।

(च) ख की हत्या के लिए क विचारित किया जाता है । यह तथ्य कि ख ने क पर अपमान-लेख के लिए अभियोजन चलाया था और क दोषसिद्ध और दण्डित किया गया था, धारा 8 के अधीन विवाद्यक तथ्य का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है ।]

संशोधन टिप्पणियां

  1. 1891 के अधिनियम सं० 3 की धारा 5 द्वारा अन्तःस्थापित ।

यह वेबसाइट केवल जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। किसी भी अंतर की स्थिति में भारत के राजपत्र में प्रकाशित आधिकारिक पाठ ही मान्य होगा।